
हिन्दी में लिखने को मन हमेशा करता था पर जब मेरे पहले blog को मेरी माँ ने दूसरों के माध्यम से समझा तो मेरी हिन्दी में लिखने की जरूरत और भी प्रबल हो गई. फिर गौरीलंकेश की हत्या ने इसे इस सप्ताह की मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता बना दिया. गौरीलंकेश कन्नड़ में लिखती थी.
बहस, चर्चा, टिप्पणी, कटाक्ष, आरोप और प्रत्यारोपों के बीच हर रोज़ की तरह रसोइ घर का काम जल्द निपट गया और फिर एक बार ख़बरों के सहारे मैंने भारत में एक और दिन बिताया. पहलू खा़न जैसे लोग मुझे फिर एक बार अन्दर तक हिला जाते हैं – शायद वो मेरे अपने हैं, तो कुछ तस्वीरें स्मरणपटल पर घाव कर जाती हैं और सवाल रात भर पीछा करते हैं. प्रश्न खुद ही उठते हैं और चित्त उनके जवाब ढूंढने में लग जाता है जिसमें मेरी इज़ाज़त की ज़रूरत किसी को नहीं पड़ती.
वैसे तो विश्व स्तर पर राजनीति किसी नैतिक पैमाने पर तुल कर काम नहीं करती और लगभग हर देश के राजनैतिक निर्णय वहाँ के औद्योगिक-समीकरण, वोट-बैंक, सत्ता-स्वार्थ और धनी व प्रभावशाली के दबाव को स्पष्ट तौर पर दिखाते हैं, पर बीते कुछ दशकों में भारत में राजनीति सत्ता की पर्याय बन गई और इसका प्रतिबिम्ब समाज पर प्रायः भयावह दिखाई पड़ा.
समाज, जो राजनीति के दायरे सुनिश्चित करता है, की दूरदृष्टि राजनीति द्वारा सीमित कर दी गई.
2014 में भारतीय राजनीति ने फिर एक बार बड़ी करवट ली तो लगा जन जागरुकता की मिसाल कायम हुई है और विकास व प्रगतिशीलता की तस्वीर अब सहज ही उभरती नजर आएगी. पर जल्द ही पिछली सरकार की तरह यह भी शर्मिंदगी का सबब बन जाएगी ऐसा मैने न सोचा था.
निजी तौर पर मुझे traditional politics से कोइ उम्मीद तो नहीं थी, पर जन-मानस की आने वाली नई सरकार से आसमान-से-ऊँची आकांशाओं और उऩके दृढ़ विश्वास ने मेरे अविश्वास को जीत लिया. मैंने स्वयं को यह कह कर समझा लिया कि शायद मेरे राजनैतिक ज्ञान और सूझबूझ अभी उतऩे परिपक्व नहीं कि मैं किसी तजुर्बेकार के नेतृव से नाउम्मीदी करूं. 2013 की मेरी ये facebook post इसका सबूत है.
Nothing wrong in giving him a chance this time, he has done a good job in Gujarat , y not try him for the centre this time… Secularism does not feed a family, hunger creates more and lasting destruction than a riot does. Corruption makes life frustrating…
And then Gujarat riots were not first in India …. If Congress could survive after Sikh manslaughter so can Modi…
—— an educated and frustrated congressi who always has the freedom of choice to vote and experiment in a democratic setup , doesn’t matter even if the experiment fails…
चूंकी हमारे यहां राजनैतिक भ्रष्टाचार की सज़ा जैसी कोई रिवाज़ नहीं, 2014 का लगभग अभूतपूर्व जनमत लोगों के पिछली सरकार पर आक्रोश और उनकी खुली लूट के लिए एक सजा जैसा था. काँग्रेसी लाला – नेता के भेष में रहने वाले पारिवार-ग़ुलाम अब इस भेष से बाहर आ सकते थे. दिल्ली इस बार इतिहास के पन्नों पर नहीं बल्कि इन लालाओं ने खेल के मैदान में लूटी थी और तब का मेरा प्रधानमंत्री चुप रहा, मैं उस चुप्पी पर आज भी शर्मिन्दा हूँ.
वहीं दूसरी ओर अलगाववादी इतिहास रखने वाली नई सरकार से सामाजिक न्याय की अपेक्षा मूर्खता थी पर औद्योगिक व निर्माणवादी आर्थिक स्वावलंबिता निकट ही दिखाई पड़ने लगी. इस अपेक्षा को पूरा करने हेतु शुरूआती विदेश यात्राओं के दौरान दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र का चुना हुआ सिपाही अपनी पार्टी सोच से बाहर आने में विफल होता तब दिखाई पड़ा जब उन्होने यह टिप्पणी की कि भारतीयों को भारतीय होने पर शर्म महसूस होती होगी.
इसके बाद बहुत सी ऐसी बातें और ऐसे फैंसले हुए जिसने मौजूदा सरकार को काँग्रस+गाय सिद्ध कर दिया. पर पिछले सप्ताह ख़बरों में कुछ ऐसा मिला जो मेरे इस लेख को लिखने का कारण बना.
मैने पढ़ा और विश्वास ऩहीं किया कि गौरीशंकर की हत्योप्रांत twitter पर असभ्य व बेहुदा टिप्पणी करने वाला शख्स, प्रधानमंत्री दारा twitter पर follow किए जाने वाले 1714-कुछ लोगों में से एक है. इससे पहले भी मैंने विपक्ष को ऐसा ही कुछ कहते सुना था, पर party politics का हवाला देते, उसे महत्व नहीं दिया. लेकिन इस बार आरोप सटीक था तो मैंने किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कुछ जाच-पडंताल करनी ठीक समझी.
खोजने पर मुझे पता चला कि यह सचमुच एक तथ्य है जिसे कोई भी twitter account रखने वाला आसानी से देख सकता है.
अगला सवाल यह था कि क्या महानायक महाव्यस्त होते हुए भी अपना account स्वयं संभालते हैं? एक RTI के जवाबानुसार उत्तर ‘हां’ था. मैंने फिर एक बार propaganda news का counter argument देते हुए सोचा कि हो सकता है महानायक को इसकी भनक न हो! पर फिर सोचा कि क्या PMO भी बेखबर है? और यदि है, तो क्या ये PMO की असक्षमता नहीं जो प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को ताक पर रखे है.
और गहरा खोदा तो पाया कि यह पहला और अकेला ऐसा वाक्या नहीं जब महानायक द्वारा follow किए गए दुर्योधनों ने भद्र महिलाओं को अभद्र शब्द कहे हैं. ऐसी कई गाली-गलौच भरे tweets मेरे सामने आए जिनमें लगभग हर tweet में महिलाओं को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वैश्या कहा गया. उनके tweets से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे इस दुनिया में केवल दो प्रकार की महिलाऐं हैं – एक जिन पर उनका वर्चस्व है और बाकी सभी वैश्याएँ.
बेटी-बचाओ कहने वाले भीष्म की e-उपस्थिति में द्रोपिदयों को बार-बार वैश्या कहा गया और भीष्म चुप हैं. मैं आज फिर इस चुप्पी पर शर्मिन्दा हूँ.
(situation a week before publishing).
Photo source with thanks- http://www.bodahub.com/indian-right-wing-nationalism-feminism/